जय भारत :-
तथाकथित भारतीय भाई कृपया ध्यान देने की कृपा करें...!
विदेशी काल गणनानुसार, १-जनवरी को आरम्भ होने वाले नये वर्ष की शुभकामनाओं के आदान-प्रदान का पिछले कुछ वर्षों से अनेक प्रकार से विरोध हो रहा था...
और होना भी चाहिए...
अधिकतर विरोधी इसे विदेशियों की ग़ुलामी से जकड़ी हुई प्रथा कह रहे हैं...
और राष्ट्र-कवि आ. दिनकरजी की कविता को टीप रहे है...
मालूम हो कि...
मैं स्वयँ भी एक भारतीय होने के नाते से...
किसी विदेशी प्रथा को सहज में स्वीकार नहीं करता हूँ...
इसीलिए मेरे...
बहुप्रचलित और बहुमान्य...
नव-वर्ष-२०२० के शुभकामना संदेश में...
आप पहले भारतीय काल-गणना का विवरण पायेंगे...
फिर तदनुसार...१-जनवरी-२०२० लिखा पायेंगे...!
लेकिन...इसके साथ ही साथ...!
विषय का विरोध करने वाले तथाकथित अपने भारतीय भाईयों से पूछना चाहता हूँ कि-
१- वे अपने इस तथाकथित विरोधी अभियान के प्रति कितने व्यावहारिक हैं ?
२- कितने लोग हैं जिन्हें भारतीय वैदिक-काल गणना का ज्ञान है ?
३- कितने लोग हैं जिन्हें यह मालूम है कि भारतीय काल गणना मोटे तौर पर दो सिद्धान्तों पर आधारित है ?
४- कितने लोग हैं जिन्हें अपनी (भारतीय) कुल परम्पराओं का ज्ञान है और उसे वे अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ने वाले अपने बच्चों को भी प्रदान कर रहे हैं ?
५- कितने लोग हैं जो अपने बच्चों की विदेशी शिक्षा और उससे होने वाली विदेशी आय का लोभ त्याग कर, उनकी स्वदेशीय शिक्षा और स्वदेशीय आय से सन्तुष्ट रहना चाहते हैं ?
इस विषय पर तो- “पर उपदेस कुसल बहुतेरे” की बात सर्वत्र चरितार्थ होती दिखाई देती है...!
६- बताना चाहता हूँ कि मेरे पड़ोसी मुसलमान (परिवार) हैं और उनके बच्चे भी अंग्रेज़ी स्कूलों में ही पढ़ते हैं...
लेकिन...उन्हें विशेषतौर पर से उर्दू पढ़ाने के लिए और निश्चित ही क़ुरान पढ़ना सिखाने के लिए अलग से एक मौलाना लगभग रोज़ ही उनके घर आते हैं...!
७- लेकिन हम में से कितने लोग हैं जो अंग्रेज़ी और अन्य विषयों के साथ साथ अपने बच्चों को अलग से संस्कृत पढ़ाने का विशेष प्रबन्ध करते हैं ? जो संसार की सभी भाषाओं की जननी है और जिसे देव-भाषा कहते है और अब तो यह भी सिद्ध हो चुका है कि संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा है...! फिर भी...???
८- कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को- “प्रात काल उठ कै रघुनाथा।
मातु पिता गुर नावहिं माथा॥"(श्रीराम.च.मा.-१/२०४/७) की परम्परा में ढालते हैं...?
८- कितने लोग हैं जो अपने बच्चों द्वारा...
डैड-मौम और गुड मौर्निंग कहना रुकवा उन्हें...नित्य नमस्कार, प्रणाम या राम-राम कहना सिखाते हैं...?
९- कितने ही लोग ऐसे होंगे जिन्होंने श्रीरामायणजी और श्रीगीताजी का केवल नाम ही सुना होगा और वही स्थिति उनके बच्चों की भी होगी। वेदों-पुराणों की बात तो दूर की है।
१०- मेरे सम्पर्क में अनेक ऐसे भागवत-जन हैं, जो कहते कि पड़ोस के मन्दिर में कभी कभी तो पुजारी अकेले ही भगवान की आरती करते हैं..कोई घंटा बजाने वाला भी उपलब्ध नहीं होता...!
११- उपर्युक्त के विपरीत...कोई मुसलमान जुम्मे की नमाज़ नहीं छोड़ता...!
कोई ईसाई रविवार को चर्च जाना नहीं छोड़ता...!
हमारे सिख भाई तो नियमित गुरुद्वारा जाते ही हैं...!
१२- हिन्दू बहुमत अथवा जनसंख्या वृद्धि के नाम पर हम में और मुसलमानों में...१ और ८ अनुपात बताया जाता है...
हमारे विवाहित बच्चे तो अपनी व्यक्ति सुविधाओं में इतने मस्त हैं वे वंश वृद्धि हेतु, एक-एक बच्चा पैदा करने से भी क़तरा रहे हैं...!
१३- और भी अनेक अनकही बातें हैं जो हमारी देश-भक्ति, कुल परम्पराओं और यहाँ तक कि महासंकट में पड़े हुए स्वयँ के अस्तित्व तक की विषमतम स्थिति के प्रति प्रश्न उठाती हैं...?
१४- लेकिन हमें इन सब बातों से क्या लेना-देना है...?
१५- हम तो बस ज़बानी-ख़र्च से ही ख़ुश होने के आदी बन चुके हैं...!
१६- यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि ६००-७०० वर्ष पुराना इतिहास दुहराने को मुँह बायें खड़ा है...!
फिर भी व्यावहारिकता के नाम पर हम आइना देखने को तैयार ही नहीं हैं...!
१६- हम तो बस क्रिसमस-दिवस और विदेशी नये वर्ष का विरोध करके अपना कर्तव्य पूरा हुआ समझ के ही सन्तुष्ट हैं...!
१७- भारतीय बनने का कुछ प्रयास तो करें....!
१८- परम उचित होगा कि कम से कम अंग्रेज़ी वर्ष का विरोध करने वाले लोग तो...कल १-जनवरी से ही...भारतीय काल गणनानुसार ...दिनांक आदि का प्रयोग करना तो शुरु करें...!
१९- कोरे ख़ाली ज़बानी ख़र्च से तो कुछ भी होने जाने वाला है...नहीँ...???
-: जय भारत :-
तथाकथित भारतीय भाई कृपया ध्यान देने की कृपा करें...!
विदेशी काल गणनानुसार, १-जनवरी को आरम्भ होने वाले नये वर्ष की शुभकामनाओं के आदान-प्रदान का पिछले कुछ वर्षों से अनेक प्रकार से विरोध हो रहा था...
और होना भी चाहिए...
अधिकतर विरोधी इसे विदेशियों की ग़ुलामी से जकड़ी हुई प्रथा कह रहे हैं...
और राष्ट्र-कवि आ. दिनकरजी की कविता को टीप रहे है...
मालूम हो कि...
मैं स्वयँ भी एक भारतीय होने के नाते से...
किसी विदेशी प्रथा को सहज में स्वीकार नहीं करता हूँ...
इसीलिए मेरे...
बहुप्रचलित और बहुमान्य...
नव-वर्ष-२०२० के शुभकामना संदेश में...
आप पहले भारतीय काल-गणना का विवरण पायेंगे...
फिर तदनुसार...१-जनवरी-२०२० लिखा पायेंगे...!
लेकिन...इसके साथ ही साथ...!
विषय का विरोध करने वाले तथाकथित अपने भारतीय भाईयों से पूछना चाहता हूँ कि-
१- वे अपने इस तथाकथित विरोधी अभियान के प्रति कितने व्यावहारिक हैं ?
२- कितने लोग हैं जिन्हें भारतीय वैदिक-काल गणना का ज्ञान है ?
३- कितने लोग हैं जिन्हें यह मालूम है कि भारतीय काल गणना मोटे तौर पर दो सिद्धान्तों पर आधारित है ?
४- कितने लोग हैं जिन्हें अपनी (भारतीय) कुल परम्पराओं का ज्ञान है और उसे वे अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ने वाले अपने बच्चों को भी प्रदान कर रहे हैं ?
५- कितने लोग हैं जो अपने बच्चों की विदेशी शिक्षा और उससे होने वाली विदेशी आय का लोभ त्याग कर, उनकी स्वदेशीय शिक्षा और स्वदेशीय आय से सन्तुष्ट रहना चाहते हैं ?
इस विषय पर तो- “पर उपदेस कुसल बहुतेरे” की बात सर्वत्र चरितार्थ होती दिखाई देती है...!
६- बताना चाहता हूँ कि मेरे पड़ोसी मुसलमान (परिवार) हैं और उनके बच्चे भी अंग्रेज़ी स्कूलों में ही पढ़ते हैं...
लेकिन...उन्हें विशेषतौर पर से उर्दू पढ़ाने के लिए और निश्चित ही क़ुरान पढ़ना सिखाने के लिए अलग से एक मौलाना लगभग रोज़ ही उनके घर आते हैं...!
७- लेकिन हम में से कितने लोग हैं जो अंग्रेज़ी और अन्य विषयों के साथ साथ अपने बच्चों को अलग से संस्कृत पढ़ाने का विशेष प्रबन्ध करते हैं ? जो संसार की सभी भाषाओं की जननी है और जिसे देव-भाषा कहते है और अब तो यह भी सिद्ध हो चुका है कि संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा है...! फिर भी...???
८- कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को- “प्रात काल उठ कै रघुनाथा।
मातु पिता गुर नावहिं माथा॥"(श्रीराम.च.मा.-१/२०४/७) की परम्परा में ढालते हैं...?
८- कितने लोग हैं जो अपने बच्चों द्वारा...
डैड-मौम और गुड मौर्निंग कहना रुकवा उन्हें...नित्य नमस्कार, प्रणाम या राम-राम कहना सिखाते हैं...?
९- कितने ही लोग ऐसे होंगे जिन्होंने श्रीरामायणजी और श्रीगीताजी का केवल नाम ही सुना होगा और वही स्थिति उनके बच्चों की भी होगी। वेदों-पुराणों की बात तो दूर की है।
१०- मेरे सम्पर्क में अनेक ऐसे भागवत-जन हैं, जो कहते कि पड़ोस के मन्दिर में कभी कभी तो पुजारी अकेले ही भगवान की आरती करते हैं..कोई घंटा बजाने वाला भी उपलब्ध नहीं होता...!
११- उपर्युक्त के विपरीत...कोई मुसलमान जुम्मे की नमाज़ नहीं छोड़ता...!
कोई ईसाई रविवार को चर्च जाना नहीं छोड़ता...!
हमारे सिख भाई तो नियमित गुरुद्वारा जाते ही हैं...!
१२- हिन्दू बहुमत अथवा जनसंख्या वृद्धि के नाम पर हम में और मुसलमानों में...१ और ८ अनुपात बताया जाता है...
हमारे विवाहित बच्चे तो अपनी व्यक्ति सुविधाओं में इतने मस्त हैं वे वंश वृद्धि हेतु, एक-एक बच्चा पैदा करने से भी क़तरा रहे हैं...!
१३- और भी अनेक अनकही बातें हैं जो हमारी देश-भक्ति, कुल परम्पराओं और यहाँ तक कि महासंकट में पड़े हुए स्वयँ के अस्तित्व तक की विषमतम स्थिति के प्रति प्रश्न उठाती हैं...?
१४- लेकिन हमें इन सब बातों से क्या लेना-देना है...?
१५- हम तो बस ज़बानी-ख़र्च से ही ख़ुश होने के आदी बन चुके हैं...!
१६- यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि ६००-७०० वर्ष पुराना इतिहास दुहराने को मुँह बायें खड़ा है...!
फिर भी व्यावहारिकता के नाम पर हम आइना देखने को तैयार ही नहीं हैं...!
१६- हम तो बस क्रिसमस-दिवस और विदेशी नये वर्ष का विरोध करके अपना कर्तव्य पूरा हुआ समझ के ही सन्तुष्ट हैं...!
१७- भारतीय बनने का कुछ प्रयास तो करें....!
१८- परम उचित होगा कि कम से कम अंग्रेज़ी वर्ष का विरोध करने वाले लोग तो...कल १-जनवरी से ही...भारतीय काल गणनानुसार ...दिनांक आदि का प्रयोग करना तो शुरु करें...!
१९- कोरे ख़ाली ज़बानी ख़र्च से तो कुछ भी होने जाने वाला है...नहीँ...???
-: जय भारत :-
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें